छग राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष पर FIR, फर्म की जमीन या निजी खेल?
17 साल पुराना जमीन विवाद: खाता बंटा, रजिस्ट्रियां हुईं, अब FIR से मचा हड़कंप

दुर्ग में श्री ऋद्धि सिद्धि बिल्डर्स की जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब पुलिस की FIR तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष कांतिलाल बोथरा समेत संबंधित लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोप में अपराध दर्ज किया गया है। मामला सिर्फ जमीन के बंटवारे का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि जिस जमीन को सालों तक साझेदारी फर्म की संपत्ति बताया गया, उसका बाद में कथित तौर पर व्यक्तिगत हिस्सों में खाता विभाजन कैसे हो गया?
2009 में बनी थी फर्म
श्री ऋद्धि सिद्धि बिल्डर्स वर्ष 2009 में दुर्ग में बनी एक अपंजीकृत साझेदारी फर्म थी। इसका काम जमीन खरीदना, कॉलोनी विकसित करना और रियल एस्टेट कारोबार करना था। फर्म में छह साझेदार बताए गए हैं—कांतिलाल बोथरा, सजल जैन, विश्वास गुप्ता, मनीष शर्मा, रूपेश जैन और अमृता खंडेलवाल।
कमलाबाई की जमीन बनी जड़
पूरे विवाद की जड़ स्वर्गीय कमलाबाई बोथरा की जमीन है। शिकायत के मुताबिक उन्होंने अपनी निजी जमीन फर्म में पूंजी के रूप में दी थी। इसके बदले उन्हें फर्म में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली। यानी जमीन बेचकर रकम लेने के बजाय जमीन को साझेदारी की पूंजी बनाया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि इसके बाद जमीन फर्म की संपत्ति बन गई।
नौ साल तक सब ठीक?
2009 से करीब 2018 तक फर्म का कारोबार चलता रहा। फर्म के नाम जमीन खरीदी गई। कॉलोनी विकसित हुई। सरकारी अनुमति ली गई। जमीन को फर्म की संपत्ति के रूप में लेखा रिकॉर्ड में दिखाया गया। बिक्री भी फर्म के खाते में दर्ज हुई और मुनाफे पर आयकर जमा किया गया। करीब नौ साल तक कोई बड़ा सार्वजनिक विवाद सामने नहीं आया।
कोरे कागजों के हस्ताक्षर का आरोप
विवाद की असली शुरुआत 2018-19 के आसपास बताई गई है। साझेदार रूपेश जैन का आरोप है कि फर्म को आपसी सहमति से खत्म करने की बात कहकर उनसे कुछ कोरे कागज और स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर कराए गए। बाद में उन्हें शक हुआ कि इन्हीं हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कथित तौर पर खाता विभाजन और दूसरे दस्तावेज तैयार करने में किया गया।
फर्म की जमीन टुकड़ों में बंटी!
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस जमीन को वर्षों तक फर्म की संपत्ति माना गया, उसी के हिस्से को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर कुछ साझेदारों और उनके परिजनों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराया गया। इसके बाद 2024 में इनमें से कुछ भूखंडों की बिक्री भी किए जाने का आरोप है। शिकायतकर्ता के मुताबिक बिक्री की रकम सभी साझेदारों को उनके हिस्से के अनुपात में नहीं मिली।
RTI ने खड़े किए बड़े सवाल
मामले में राजस्व रिकॉर्ड की जांच हुई तो खाता विभाजन की प्रक्रिया पर सवाल उठे। रिकॉर्ड में दावा था कि सभी पक्षों की सहमति ली गई, इश्तहार प्रकाशित हुआ, फर्द बंटवारा बना, पक्षकारों के बयान हुए और पटवारी रिपोर्ट ली गई। लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक RTI में इन दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं।
तहसीलदार और पटवारी के जवाब अलग
मामले में तत्कालीन तहसीलदार ने प्रक्रिया पूरी होने की बात कही, जबकि संबंधित हल्का पटवारी ने ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी। दोनों जवाबों के बीच विरोधाभास ने विवाद को और गंभीर बना दिया। सवाल उठने लगा कि आखिर खाता विभाजन हुआ तो उसके दस्तावेज कहां हैं?
अपर कलेक्टर के आदेश ने खोली परत
उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक अपर कलेक्टर, दुर्ग के आदेश में कहा गया कि बिना प्रकरण दर्ज किए, बिना इश्तहार, बिना फर्द बंटवारा और संबंधित पक्ष की अनुपस्थिति में खाता विभाजन किया गया। इसे नियमानुसार नहीं पाया गया। एसडीएम की जांच में भी छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 178 और 178(क) के पालन पर सवाल उठे।
अफसर पर विभागीय कार्रवाई
मामला यहीं नहीं रुका। आयुक्त, दुर्ग संभाग की ओर से संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय आरोप-पत्र जारी होने की बात सामने आई। आरोप यह था कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की गई। यानी जमीन विवाद के साथ अब राजस्व प्रक्रिया भी कटघरे में आ गई।
एक जमीन, दो रिकॉर्ड!
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है। एक तरफ राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का कथित विभाजन हुआ और उसे व्यक्तिगत हिस्सों में दिखाया गया। दूसरी तरफ फर्म के लेखा रिकॉर्ड में वही जमीन फर्म की संपत्ति बनी रही। बिक्री फर्म के नाम से दिखाई गई और मुनाफे पर आयकर भी जमा किया गया। फिर सवाल उठता है—जमीन निजी थी तो फर्म की किताबों में क्यों? और फर्म की थी तो निजी खाता विभाजन किस आधार पर?
2024 में रजिस्ट्रियों ने बढ़ाया विवाद
शिकायतकर्ता के मुताबिक 2024 में उन्हें विवादित भूमि के कुछ हिस्सों की बिक्री की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने प्रधान जिला न्यायालय, दुर्ग में घोषणा, रजिस्ट्री निरस्तीकरण, बंटवारा, कब्जा और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए सिविल वाद दायर किया। उनका तर्क है कि कथित अवैध खाता विभाजन के आधार पर हुई आगे की रजिस्ट्रियां भी विवादित हैं।
अब FIR ने बढ़ाई हलचल
सिविल विवाद के साथ शिकायतकर्ता ने आपराधिक कार्रवाई की मांग भी की। उपलब्ध सामग्री के अनुसार सक्षम न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की जांच जरूरी मानते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ FIR और विवेचना के निर्देश दिए। इसके बाद पुलिस ने धोखाधड़ी और साझा मंशा से जुड़े प्रावधानों में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की।
17 साल बाद सबसे बड़ा सवाल
करीब 17 साल पुराने इस विवाद में अब तीन मोर्चे खुल चुके हैं—राजस्व, सिविल और आपराधिक। विभागीय जांच में प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। सिविल कोर्ट में जमीन और रजिस्ट्रियों का विवाद लंबित है। पुलिस FIR के बाद दस्तावेजों और आरोपों की जांच कर रही है।
अब असली सवाल यह है कि साझेदारी फर्म की संपत्ति का कथित खाता विभाजन आखिर किस आधार पर हुआ? क्या जरूरी दस्तावेज वास्तव में तैयार हुए थे? राजस्व रिकॉर्ड और फर्म के लेखा रिकॉर्ड में विरोधाभास क्यों है? और यदि प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
फिलहाल पुलिस जांच जारी है। आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद ही होगी।



