
रायपुर। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत में मंगलवार को बड़ा आमना-सामना हुआ। रायपुर प्रेस क्लब में हुई खुली बहस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने एक-दूसरे के सामने अपने आंकड़े रखे। बहस में सबसे ज्यादा टकराव इस बात पर हुआ कि पीएम आवास की सफलता का पैमाना स्वीकृति है या बनकर तैयार हो चुका मकान।
विजय शर्मा ने मौजूदा सरकार के करीब तीन साल के काम को सबसे बड़ा आधार बनाया। उन्होंने दावा किया कि साय सरकार के कार्यकाल में अब तक 11 लाख 75 हजार मकान पूरे हो चुके हैं और इनके निर्माण पर करीब 16 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। हाल में 3 लाख 65 हजार नए मकानों की मंजूरी मिलने की बात भी उन्होंने रखी।
शर्मा ने पिछली कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि उसके पांच साल के कार्यकाल में पीएम आवास के लिए वित्तीय मंजूरी करीब 3,900 करोड़ रुपए थी। इसके मुकाबले मौजूदा सरकार करीब तीन साल में 16 हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। उनका जोर इस बात पर रहा कि केंद्र से मिले मौके को मौजूदा सरकार ने मकान बनाने में बदला।
बहस में 7.81 लाख PWL आवासों का मुद्दा भी उठा। शर्मा ने आरोप लगाया कि तत्कालीन सरकार ने केंद्र से उपलब्ध कराए गए आवासों को स्वीकार करने में जरूरी कदम नहीं उठाए। उन्होंने 2020-21 में केंद्र से मिले 6.48 लाख आवासों को स्वीकार नहीं किए जाने का दावा भी किया। यानी भाजपा का पूरा तर्क इस बात के इर्द-गिर्द रहा कि केंद्र ने मंजूरी दी और मौजूदा सरकार ने उसे जमीन पर उतारा।
इसके जवाब में भूपेश बघेल ने आंकड़ों को दूसरे तरीके से देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि केवल यह बताने से तस्वीर साफ नहीं होती कि कितने मकान बन गए। यह भी बताना होगा कि किस सरकार के समय कितने आवास मंजूर हुए, कितने स्वीकार हुए, कितने निर्माणाधीन रहे और कितने पूरे हुए।
बघेल ने पीएम आवास के लिए इस्तेमाल होने वाली अलग-अलग सूचियों और पोर्टल का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि 2022-23 में पोर्टल बंद रहने से योजना की प्रक्रिया प्रभावित हुई और उनकी सरकार को केंद्र से राशि नहीं मिल सकी। उन्होंने मौजूदा सरकार की ओर से बताई जा रही अलग-अलग मंजूरियों का हिसाब जोड़ते हुए सवाल किया कि अगर इतने मकान मंजूर हो चुके हैं तो वास्तव में कितने घर बनकर तैयार हुए?
इस बहस का सबसे अहम पहलू यह रहा कि दोनों नेता अलग-अलग आंकड़ों को अपनी सरकार के पक्ष में इस्तेमाल करते नजर आए। शर्मा ने निर्माण और खर्च को उपलब्धि बताया, जबकि बघेल ने स्वीकृति, पोर्टल और मंजूर मकानों के मुकाबले वास्तविक निर्माण का हिसाब मांगा।
केंद्र के ग्रामीण विकास मंत्रालय के जुलाई 2026 में लोकसभा में दिए आंकड़ों से भी यह फर्क साफ होता है। 2021-22 से 2025-26 के बीच छत्तीसगढ़ में पीएम आवास ग्रामीण के 13 लाख 54 हजार 352 मकान मंजूर हुए थे। इनमें 9 लाख 63 हजार 548 मकान पूरे और 3 लाख 90 हजार 804 निर्माणाधीन बताए गए थे।
यानी सरकारी आंकड़ों में भी मंजूरी और निर्माण दो अलग चीजें हैं। यही फर्क मंगलवार की बहस का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया। सवाल अब यह है कि गरीब परिवार के लिए असली उपलब्धि क्या मानी जाए—कागज पर मंजूर मकान या ऐसा घर जिसकी चाबी उसके हाथ में पहुंच चुकी है?





