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आयुष्मान फर्जीवाड़े पर बड़ा फैसला, स्पर्श हॉस्पिटल में होगा फोरेंसिक ऑडिट

भिलाई के बड़े हॉस्पिटल पर NCLT का हथौड़ा, करोड़ों के कुप्रबंधन की होगी फोरेंसिक जांच

 

भिलाई। भिलाई के चर्चित स्पर्श मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल में सत्ता का पूरा समीकरण बदल गया है। राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की कटक पीठ ने अस्पताल के मौजूदा प्रबंधन से नियंत्रण छीन लिया है। अदालत ने पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) दीप चंद्र जोशी को स्वतंत्र प्रशासक नियुक्त किया है। यह फैसला अल्पसंख्यक शेयरधारकों अजय सोमानी और प्रदीप पाल की याचिका पर आया है। अदालत ने माना कि अस्पताल में कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। सबसे अहम आधार आयुष्मान भारत योजना में सामने आई अनियमितताओं को बनाया गया।

कोर्ट बोली- आयुष्मान में गड़बड़ी, कुप्रबंधन का बड़ा सबूत

‘द सूत्र’ के पास मौजूद आदेश के मुताबिक NCLT ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में कथित फर्जी बिलिंग, तय सीमा से अधिक नकद वसूली और उसके बाद अस्पताल का डी-एम्पैनल होना महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। यह कंपनी के भीतर गंभीर कुप्रबंधन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की विफलता का संकेत है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिनव कार्डेकर ने अदालत में दलील दी कि अस्पताल प्रबंधन ने जनहित की योजना का दुरुपयोग किया। अदालत ने इन तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए प्रबंधन में हस्तक्षेप का फैसला सुनाया।

बहुसंख्यक निदेशकों पर मनमानी के आरोप

मामले में केवल आयुष्मान योजना ही सवालों के घेरे में नहीं रही। याचिका में आरोप लगाया गया कि बहुसंख्यक शेयरधारकों ने बड़े पैमाने पर नकद लेनदेन किए। कंपनी की रकम का दुरुपयोग हुआ। अल्पसंख्यक निदेशकों अजय सोमानी और प्रदीप पाल को धमकियां दी गईं, जिससे वे बोर्ड बैठकों में शामिल नहीं हो सके। बाद में उनकी अनुपस्थिति का हवाला देकर निदेशक पद ही खत्म कर दिया गया। अदालत ने इस कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया। दोनों को दोबारा निदेशक पद पर बहाल करते हुए उनके कार्यकाल की निरंतरता को भी मान्यता दे दी।

फोरेंसिक ऑडिट से खुलेंगे कई राज

NCLT ने स्वतंत्र प्रशासक को कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड की गहन जांच कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने फोरेंसिक ऑडिटर नियुक्त करने को भी कहा है। यह ऑडिट नकद लेनदेन, खातों में कथित हेराफेरी, फंड के इस्तेमाल और अन्य वित्तीय फैसलों की जांच करेगा। साथ ही विवादित अवधि में लिए गए कॉर्पोरेट निर्णयों और शेयर मूल्यांकन की भी समीक्षा होगी। माना जा रहा है कि जांच में कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं।

कॉर्पोरेट जगत में बना मिसाल वाला फैसला

कंपनी कानून के जानकार इस फैसले को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। वजह यह है कि पहली बार आयुष्मान भारत योजना में कथित गड़बड़ियों और डी-एम्पैनलमेंट को कंपनी में कुप्रबंधन के अहम आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। अधिवक्ता अभिनव कार्डेकर ने इसे अल्पसंख्यक शेयरधारकों के अधिकारों की बड़ी जीत बताया। वहीं भिलाई के मेडिकल और कॉर्पोरेट जगत में इस फैसले के बाद हलचल तेज हो गई है। अब सबकी नजर फोरेंसिक ऑडिट पर है, जिससे यह साफ हो सकेगा कि अस्पताल के वित्तीय और प्रशासनिक संचालन में आखिर क्या-क्या गड़बड़ियां हुईं।

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