
छत्तीसगढ़ में जनसमस्याओं के त्वरित निराकरण के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का विरोधाभास एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। सीएम हेल्पलाइन पर शिकायतों के निराकरण का आंकड़ा 88.85 प्रतिशत दिखाकर सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन इसी उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में प्रशासनिक सुस्ती और घोर लापरवाही की पोल भी खुल गई। राजस्व मामलों में लगातार मिल रही शिकायतों और आम जनता के काम अटकाने के आरोप में कबीरधाम जिले के पिपरिया में पदस्थ तहसीलदार प्रमोद कुमार चन्द्रवंशी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इस कड़ी कार्रवाई ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर लगभग नब्बे फीसदी मामले सुलझ रहे हैं, तो मैदानी स्तर पर जनता दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश क्यों है?
**लापरवाही और स्वेच्छाचारिता पर सख्त एक्शन**
सीएम हेल्पलाइन (1076) पर दर्ज शिकायतों की विस्तृत प्रगति की समीक्षा के दौरान राजस्व विभाग के लंबित मामलों पर विशेष पड़ताल की गई। इस दौरान पाया गया कि पिपरिया तहसील क्षेत्र में जमीन विवाद, सीमांकन, नामांतरण और दुरुस्ती जैसे बुनियादी जनहित से जुड़े प्रकरणों को जानबूझकर लटकाया जा रहा था। समीक्षा बैठक में तहसीलदार प्रमोद कुमार चन्द्रवंशी के कामकाज में गंभीर लापरवाही, मनमानी और स्वेच्छाचारिता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। शासन ने माना कि आम नागरिकों से जुड़ी शिकायतों के निपटारे में अधिकारी का रवैया कतई संतोषजनक नहीं था। इसके तुरंत बाद राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने कठोर रुख अपनाते हुए निलंबन आदेश जारी कर दिया। अवर सचिव धनंजय नेताम के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी यह आदेश तत्काल प्रभाव से पूरे राज्य में प्रशासनिक महकमे में हलचल मचा चुका है।
**आचरण नियमों के उल्लंघन पर मुख्यालय अटैच**
शासन की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि संबंधित अधिकारी का यह आचरण छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियमों का सीधा और खुला उल्लंघन है। निलंबन अवधि के दौरान प्रमोद कुमार चन्द्रवंशी का मुख्यालय जिला कलेक्टर कार्यालय कबीरधाम नियत किया गया है। उन्हें नियमानुसार केवल जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा। शासन ने संकेत दिए हैं कि जनता से जुड़े संवेदनशील राजस्व मामलों में टालमटोल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि केवल निलंबन से समस्या का स्थाई अंत नहीं होता; विभागीय जांच पूरी कर कठोर दंड सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
**आंकड़ों की बाजीगरी और मैदानी सच्चाई**
सीएम हेल्पलाइन का मूल उद्देश्य नागरिकों को बिना किसी परेशानी और दफ्तरों के चक्कर काटे त्वरित न्याय दिलाना था। विशेषकर राजस्व महकमे में एक आम किसान या नागरिक के लिए जमीन से जुड़े काम सीधे उसकी आजीविका से जुड़े होते हैं। ऐसे में 88.85 प्रतिशत के चमकीले आंकड़ों पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या पोर्टल पर महज औपचारिक जवाब दर्ज करके फाइलों को बंद कर दिया जाता है, या शिकायतकर्ता वास्तव में मौके पर संतुष्ट हुआ है? जब तक इन बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं किए जाते, तब तक सिर्फ एक अधिकारी पर कार्रवाई पूरे प्रशासनिक तंत्र की छवि सुधारने के लिए पर्याप्त साबित नहीं होगी।





