Uncategorized
आरडीए का महाघोटाला: मंत्री और रसूखदारों को बांटी गई करोड़ों की मनपसंद जमीन
लाभांडी-कचना-सद्दू योजना में कानूनी खेल खेलकर आम किसानों की जमीन छीनी और अरबपतियों को मुख्य सड़कों पर बांटे बेशकीमती व्यावसायिक प्लॉट, जनता में भारी आक्रोश।
रायपुर, 24 अक्टूबर। रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की लाभांडी, कचना और सद्दू नगर विकास योजना अब विकास नहीं, बल्कि सुनियोजित महाघोटाले का अखाड़ा बन चुकी है। आम जनता के अधिकारों पर डाका डालकर रसूखदारों की तिजोरियां भरने का ऐसा खुला खेल खेला गया है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दावा-आपत्तियों की कथित सुनवाई से पहले ईएनटी विशेषज्ञ और समाजसेवी डॉ. राकेश गुप्ता ने आरडीए के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलते हुए कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में पूछा है कि आरडीए के भ्रष्ट हुक्मरान पहले यह बताएं कि मूल जमीन से कोसों दूर प्राइम लोकेशन के अंतिम भूखंड (फाइनल प्लॉट) किस कानून के तहत और किसके राजनीतिक संरक्षण में बांटे गए?
डॉ. गुप्ता ने सीधा आरोप लगाया कि इस महाघोटाले की पटकथा मंत्रालय के बंद कमरों में लिखी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए मंत्रालय में 100 घंटे से ज्यादा समय तक पांच-पांच घंटे की गुप्त मैराथन बैठकें चलीं? आखिर वे कौन से चेहरे थे जो इन कमरों में बैठकर किसानों की जमीन की दलाली कर रहे थे? आरडीए को तुरंत उस कमरे का नंबर और बैठकों में शामिल अधिकारियों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए।
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा हथियार बना भाषाई हेराफेरी का कानूनी फरेब। छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 50(3)(ii)(g) का खुला दुरुपयोग किया गया। अधिनियम के अधिकृत अंग्रेजी पाठ में स्पष्ट लिखा है ‘Adjoining Lands’, जिसका सीधा और साफ मतलब होता है कि अंतिम भूखंड मूल भूमि से एकदम सटा हुआ होना चाहिए। लेकिन भू-माफिया और अफसरों के गठजोड़ ने हिंदी अनुवाद में लिखे ‘आस-पास की भूमि’ शब्द की आड़ ली।
संविधान का अनुच्छेद 348(3) साफ कहता है कि राज्यपाल द्वारा राजपत्र में प्रकाशित अंग्रेजी पाठ ही कानूनी रूप से मान्य होता है। इसके बावजूद अंग्रेजी नियम को ताक पर रखकर हिंदी शब्द का मनमाना अर्थ निकाला गया। डॉ. गुप्ता ने तीखा सवाल दागा कि क्या 4.5 किलोमीटर लंबी योजना में एक किलोमीटर दूर की जमीन को ‘आस-पास’ कहा जाएगा? अधिकारियों का यह कहना कि मूल भूमि और नया प्लॉट एक ही गांव में है, पूरी तरह से आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
सफेदपोशों की मेहरबानी का आलम यह है कि एक प्रभावशाली मंत्री की पत्नी की कंपनी को उपकृत करने के लिए सारे नियम रौंद दिए गए। उनकी मूल जमीन से करीब एक किलोमीटर दूर बलौदाबाजार मुख्य मार्ग के 150 फीट चौड़े चौराहे पर अंतिम भूखंड क्रमांक 25 थमा दिया गया। करोड़ों रुपये मूल्य का यह व्यावसायिक प्लॉट खुलेआम पक्षपात का जीवंत सबूत है। केवल यही नहीं, प्लॉट नंबर 26, 31, 63, 64 और 69 समेत दर्जनों ऐसे प्रीमियम प्लॉट हैं, जो सिर्फ अरबपतियों, उद्योगपतियों और सत्ता के दलालों की झोली में डाले गए हैं।
संविधान का अनुच्छेद 14 देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। मगर आरडीए में कानून सिर्फ गरीबों, लाचार किसानों और बिना पहुंच वाले आम नागरिकों के लिए डंडा बन गया है। जिन किसानों की पुश्तैनी जमीनें मुख्य सड़क पर थीं, उन्हें कोने-कांचरे और गड्ढों में धकेल दिया गया, जबकि रसूखदारों को मुख्य सड़कों के मुहाने पर बिठा दिया गया। यह आर्थिक डकैती नहीं तो और क्या है? डॉ. गुप्ता ने ऐसे 25 संदिग्ध प्लॉटों की सूची मुख्य सचिव को भी सौंपी है।
आरडीए द्वारा दावा-आपत्तियों की लीपापोती करने के लिए बुलाई जा रही सुनवाई केवल एक दिखावा और छलावा है। डॉ. गुप्ता ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि औपचारिकता की आड़ में इस फर्जीवाड़े पर पर्दा डालने की कोशिश कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सुनवाई का ढोंग रचने से पहले आरडीए श्वेतपत्र जारी करे और जनता को बताए कि मूल जमीन से दूर कितने प्लॉट किसके इशारे पर दिए गए।
यदि आरडीए इन तीखे सवालों का तार्किक, दस्तावेजी और कानूनी जवाब देने में नाकाम रहता है, तो जनता चुप नहीं बैठेगी। इस पूरी भ्रष्ट योजना को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाना चाहिए और दोषी अधिकारियों व उनके राजनीतिक आकाओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।





