
मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक अधोसंरचना और नई तकनीकों से जोड़कर ग्रामीण परिवारों की आजीविका को मजबूत बनाने की पहल अब जमीनी स्तर पर सकारात्मक परिणाम दे रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत अंतर्देशीय मत्स्य पालन और केज कल्चर को बढ़ावा देने से दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार के स्थायी अवसर तैयार हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गौरेला विकासखंड स्थित ग्राम देवरगांव का मल्हनिया जलाशय इसका एक सफल उदाहरण बनकर उभरा है।
मल्हनिया जलाशय में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफटी) के संयुक्त सहयोग से जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति मर्यादित के सदस्यों ने पारंपरिक मत्स्याखेट के साथ-साथ आधुनिक पिंजरा मछली पालन यानी केज कल्चर को अपनी आजीविका का मुख्य माध्यम बनाया है। इस नई व्यवस्था के शुरू होने से समिति से जुड़े आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार दर्ज किया गया है।
वर्ष 2002 से गठित इस मछुआ सहकारी समिति में वर्तमान में 44 सदस्य पंजीकृत हैं, जिनमें 26 सदस्य विशेष पिछड़ी जनजाति (पीवीटीजी) बैगा समुदाय से आते हैं। पहले ये सभी परिवार खुले जलाशय में पारंपरिक तरीकों से मछली पकड़कर स्थानीय स्तर पर बेचते थे। जलाशय की लीज राशि और अन्य जरूरी खर्चों के बाद समिति की कुल वार्षिक आय महज ढाई से तीन लाख रुपये तक ही सीमित रह पाती थी, जिससे परिवारों का भरण-पोषण मुश्किल हो जाता था।
इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए मत्स्य पालन विभाग और जिला प्रशासन की पहल पर जलाशय में कुल 54 केज स्थापित किए गए। इन केजों में उन्नत प्रजातियों की मछलियों का वैज्ञानिक पद्धति से पालन किया जा रहा है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का यह समन्वय स्थानीय मछुआरों के लिए वरदान साबित हुआ है। बेहतर देखभाल और सुरक्षित वातावरण मिलने से उत्पादन में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
केज कल्चर लागू होने के बाद समिति की आर्थिक गतिविधियों में ऐतिहासिक बदलाव आया है। समिति ने महज एक वर्ष के भीतर 10 से 15 लाख रुपये मूल्य की मछली का विक्रय करने में सफलता हासिल की है। वर्तमान में इन 54 केजों में करीब 10 से 15 टन मछली विक्रय के लिए तैयार स्थिति में उपलब्ध है।
इस परियोजना से जुड़े प्रत्येक सदस्य को अब प्रतिमाह लगभग 6 से 7 हजार रुपये की नियमित आय प्राप्त हो रही है। इस निश्चित आमदनी ने परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतों, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को पूरा करना आसान बना दिया है। इसके अलावा, आजीविका के लिए केवल मौसम और पारंपरिक शिकार पर निर्भर रहने की विवशता भी पूरी तरह समाप्त हो गई है।
मल्हनिया जलाशय का यह सफल मॉडल स्पष्ट करता है कि जब शासकीय योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन स्थानीय संसाधनों और जनजातीय समुदाय के हुनर के साथ जुड़ता है, तो आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त होता है। आधुनिक तकनीक के उपयोग से यह जलाशय अब केवल जल संरक्षण का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए आजीविका सशक्तिकरण का प्रमुख आधार बन चुका है।





