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नक्सलियों ने स्कूल तोड़े, अब उन्हीं में पढ़ेंगे बच्चे; CM साय बोले- किताब से बदलेगा बस्तर

बस्तर के 48 बंद स्कूल फिर खुले, 36 नए स्कूलों को मंजूरी; हिंसा से प्रभावित परिवारों के बच्चे अब किताब लेकर स्कूल पहुंचेंगे

रायपुर। जिस बस्तर में कभी बंदूक की आवाज स्कूल की घंटी पर भारी पड़ती थी, वहां अब तस्वीर बदल रही है। जिन स्कूलों को नक्सली हिंसा में नुकसान पहुंचा, उन्हीं स्कूलों में अब बच्चों की पढ़ाई शुरू होगी। नक्सल हिंसा के कारण लंबे समय से बंद पड़े 48 स्कूल दोबारा शुरू किए गए हैं। इसके अलावा 36 नए स्कूलों को मंजूरी दी गई है। सरकार के मुताबिक बस्तर संभाग के छह जिलों के करीब 97% गांवों तक प्राथमिक स्कूलों की पहुंच है। यानी जिन इलाकों में कभी स्कूल तक पहुंचना मुश्किल था, वहां अब शिक्षा का नेटवर्क बढ़ाया जा रहा है।

जिन स्कूलों को तोड़ा, वहीं पढ़ेंगे बच्चे

नक्सल हिंसा के दौर में स्कूल भी निशाने पर रहे। कई भवनों को नुकसान पहुंचा। कई जगह डर के कारण स्कूल बंद हुए और बच्चों की पढ़ाई रुक गई। सबसे ज्यादा नुकसान उन आदिवासी बच्चों का हुआ, जिनके लिए गांव का स्कूल ही शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा था। अब उन्हीं इलाकों में हालात बदलने की कोशिश है। आत्मसमर्पित नक्सलियों और प्रभावित परिवारों के बच्चे भी पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं।

पिता की राह नहीं, बेटे के हाथ में किताब

इस बदलाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि एक पीढ़ी अगर हिंसा के रास्ते पर भटक गई, तो अगली पीढ़ी को किताब और शिक्षा का रास्ता मिले। जिन परिवारों का नक्सल हिंसा से कभी सीधा नाता रहा, उनके बच्चों के हाथ में अब बंदूक नहीं, किताब और कॉपी होगी।

ओरछा-जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी

सरकार की तैयारी केवल पुराने स्कूल खोलने तक सीमित नहीं है। सुदूर और नक्सल प्रभावित रहे ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की योजना भी है। मकसद साफ है। इन इलाकों के बच्चों को अच्छी पढ़ाई के लिए बड़े शहरों की ओर न जाना पड़े। स्कूल और आगे की शिक्षा के अवसर उनके आसपास ही मिलें।

सड़क के साथ शिक्षा पर जोर

‘नियद नेल्ला नार 2.0’ और ‘बस्तर मुन्ने अभियान’ के जरिए अंदरूनी इलाकों में विकास पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। सड़क, बिजली, संचार और परिवहन के साथ शिक्षा का नेटवर्क मजबूत करने की कोशिश है। लेकिन चुनौती अभी बड़ी है। स्कूल खोलना पहला कदम है। असली बदलाव तब होगा, जब शिक्षक नियमित पहुंचेंगे, स्कूल लगातार चलेंगे और बच्चे बीच में पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे।

बंदूक का जवाब स्कूल की घंटी

बस्तर में अब लड़ाई सिर्फ नक्सलवाद के खिलाफ नहीं है। लड़ाई उस पीढ़ी के भविष्य के लिए भी है, जिसने डर और हिंसा के बीच बचपन देखा है। वर्षों बाद जब उन्हीं स्कूलों में बच्चे बैठेंगे, तो यह सिर्फ पढ़ाई की शुरुआत नहीं होगी। यह उस सोच की वापसी होगी, जिसमें बंदूक नहीं, किताब भविष्य तय करेगीऔर बस्तर में शायद नक्सल हिंसा का सबसे मजबूत जवाब यही होगा—बच्चों के हाथ में किताब और स्कूल में फिर गूंजती घंटी।

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