सेंगोल का है ‘नेहरू से नाता’ इलाहाबाद म्यूजियम से संसद कैसे पहुंचा ये दंड…जानिए, इसका इतिहास और सत्ता को लेकर इसकी महत्ता
PM मोदी ने 28 मई 2023 को नई संसद में सेंगोल की स्थापना की थी। सेंगोल स्पीकर की कुर्सी के पास स्थापित है Sengol

Sengol Politics
नई दिल्ली। सपा के मोहनलालगंज से सांसद आरके चौधरी ने संसद से सेंगोल को हटाकर संविधान की प्रति लगाने की मांग की। इसके बाद से सेंगोल को लेकर एक बार बहस फिर तेज हो गई है। जानिए क्या है सेंगोल का इतिहास …
दरअसल, मोहनलालगंज से सपा सांसद आरके चौधरी ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर संसद से सेंगोल हटाने की मांग की है।
सपा सांसद ने अपने पत्र में लिखा है कि, ” मैंने सांसद पद की शपथ ले ली है। जब मैं शपथ लेने सदन के पटल पर गया तो वहां देखा कि मेरी पीठ के दाहिने ओर सेंगोल रखा है, जिसे देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। महोदय, हमारा संविधान भारतीय लोकतंत्र का एक पवित्र ग्रंथ है, जबकि ‘सेंगोल’ अर्थात ‘राजदंड’ राजतंत्र का प्रतीक है। हमारी संसद लोकतंत्र का मंदिर है किसी राजे-रजवाड़े का राज महल नहीं। अतः मैं आग्रह करना चाहूंगा कि संसद भवन से सेंगोल हटाकर उसकी जगह भारतीय संविधान की विशालकाय प्रति स्थापित की जाए।”


संसद में सेंगोल की स्थापना कब हुई?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मई, 2023 को नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना की थी। इसके लिए तमिलनाडु के प्राचीन मठ के अधीनम महंत दिल्ली आए थे। उनकी मौजूदगी में ही सेंगोल की नए संसद भवन की लोकसभा में स्थापना की गई थी।
उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘सेंगोल’ यानी राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और जनता के प्रति समर्पित रहने का भी प्रतीक रहा है।

आजादी के वक्त नेहरू को दिया गया था सेंगोल
भारत सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाए जाने से कुछ दिन पहले पूछा था- क्या आप देश की आजादी का जश्न किसी तरह या प्रतीक के साथ मनाना चाहते हैं तो बताइए?

इसके बाद नेहरू देश के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी सी. राजगोपालाचारी के पास गए। राजगोपालाचारी को भारतीय संस्कृति और परंपराओं का अच्छा ज्ञान था।राजगोपालाचारी ने ही जवाहरलाल नेहरू को राजदंड भेंट करने वाली तमिल परंपरा के बारे में बताया था। इस परंपरा में राजगुरु नए राजा को सत्ता ग्रहण करने के वक्त एक राजदंड भेंट करते है। परंपरा के तहत राजगुरु थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के होते हैं। उन्होंने नेहरू को सुझाव दिया था कि जब आप प्रधानमंत्री बने तो माउंटबेटन आपको यह राजदंड स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में दे सकते हैं।
कहां और किसने बनाया सेंगोल?
पं. नेहरू को यह आइडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने तुरंत इसकी व्यवस्था करने की जिम्मेदारी भी राजगोपालाचारी को ही दे दी। राजगोपालाचारी ने सेंगोल के लिए थिरुवदुथुरै अधीनम मठ से संपर्क किया तो पता चला कि तत्कालीन प्रमुख व उनके 20वें राजगुरु श्री ला श्री अंबलवाण देसिगर स्वामी बीमार हैं। इसके बावजूद उन्होंने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की।

उन्होंने उस वक्त मद्रास के एक बेहद प्रसिद्ध जौहरी वुम्मिड़ी को चांदी का राजदंड बनाने के लिए कहा गया जिसपर सोने की परत चढ़ी हो। साथ ही यह भी बताया कि आकार कितना होगा और राजदंड के ऊपर नंदी की आकृति भी उभारी जाएगी।
अस्वस्थ होने के बावजूद राजगुरु अंबलवाण देसिगर स्वामी ने सारी व्यवस्था कराने के बाद अपने प्रतिनिधि- मणिकम ओधुवार (मठ के पुजारी ) और श्री ला श्री कुमारस्वामी तम्बीतरण (सहायक पुजारी) को दिल्ली भेजने के लिए तैयार किया। इधर राजदंड को मद्रास से दिल्ली लाने के लिए नेहरू ने एक विशेष विमान की व्यवस्था की थी।

चोल परंपरा से नेहरू को सौंपा गया था सेंगोल
14 अगस्त, 1947 की रात 11.45 बजे यानी आजादी मिलने से सिर्फ 15 मिनट पहले थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के पुजारी ने राजदंड माउंटबेटन को दिया। चोल शासन की परंपरा के मुताबिक, उस पर पवित्र जल छिड़का गया।
पुजारी ने वहां शैव समाज के संदत थिरुगनाना सांबंथर के लिखे भजन गए। मत्रोंच्चार हुआ और फिर माउंटबेटन ने राजदंड (सेंगोल) नेहरू को भेंट किया। इसके बाद नेहरू के माथे पर राख का लगाकर माला पहनाई।

आजादी के बाद सेंगोल का क्यों जिक्र नहीं हुआ?
नेहरू के बाद किसी दूसरे पीएम को सेंगोल नहीं दिया गया। सेंगोल को ऐतिहासिक धरोहर मानते हुए इलाहाबाद संग्रहालय में रख दिया गया। पांच फीट लंबा चांदी से बने इस सेंगोल पर सोने की परत चढ़ी है। इसके शीर्ष पर नंदी विराजमान हैं। यह सेंगोल करीब 75 साल तक यूपी के प्रयागराज में इलाहाबाद म्यूजियम में रखा था।
लेकिन तमिलनाडु में आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर तुगलक पत्रिका में तमिल भाषा में सेंगोल पर एक आर्टिकल पब्लिश हुआ था। मशहूर शास्त्रीय नृत्यांगना डॉ. पद्मा सुब्रमण्यम ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था। इस पत्र के साथ ही उन्होंने सेंगोल पर छपे लेख का अनुवाद भी भेजा था।

प्रधानमंत्री मोदी ने लेख पढ़ने के बाद संस्कृति एवं कला मंत्रालय को इसके बारे में पता लगाने के लिए कहा। सेंगोल की खोज अधिकारियों को इलाहाबाद संग्रहालय तक ले गई, जहां उन्हें यह एक कांच की अलमारी में सेंगोल सुरक्षित रूप से रखा हुआ मिला। हालांकि, इसके आगे विवरण में सेंगोल नहीं, नेहरू को भेंट में मिली सोने की छड़ी लिखा हुआ था।
इसके बाद इलाहाबाद संग्रहालय की ओर से 4 नवंबर 2022 को नेशनल म्यूजियम नई दिल्ली को सौंपा गया और 28 मई, 2023 को विधि-विधान के साथ इसे संसद भवन में स्पीकर की कुर्सी के पास स्थापित कर दिया गया।
जब सेंगोल को लेकर पूछे गए सवाल पर गृह मंत्री अमित शाह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, ‘इस पवित्र सेंगोल को किसी संग्रहालय में रखना अनुचित नहीं है। साथ ही उन्होंने इसे अंग्रेजों से भारतीयों के हाथ में सत्ता आने का प्रतीक करार दिया। इसलिए जब पीएम मोदी को इस सेंगोल परंपरा की जानकारी मिली तो विचार-विमर्श कर स्थापित करने का फैसला लिया। अब ये संसद में न्याय, धर्म और सत्य के प्रतीक के तौर पर स्थापित है।
क्या है सेंगोल और इसकी क्या मान्यता है?
सेंगोल तमिल शब्द है, जिसका अर्थ- ‘संपदा से संपन्न’ है। सेंगोल शब्द को संस्कृत के शब्द ‘संकु’ से लिया गया है, जिसका अर्थ ‘शंख’ होता है। शंख को वैदिक परंपरा में पौरुष के उद्घोष का प्रतीक माना जाता है। इसको राज्य के विस्तार, प्रभाव और संप्रभुता से जोड़ा जाता है। इसी तरह सेंगोल को भी राज्य की संप्रभुता, प्रभाव, विस्तार और पौरुष के प्रतीक के तौर वर्णित किया गया है।
सेंगोल को परंपरागत तौर पर ‘राजदंड’ कहा जाता है, जिसे सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक माना जाता है। यह जिसे दिया जाता है, उससे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन की उम्मीद की जाती है। इसे राजपुरोहित राजा को देता है। वैदिक परंपरा के मुताबिक, दो तरह के सत्ता के प्रतीक हैं। राजसत्ता के लिए ‘राजदंड’ और धर्मसत्ता के लिए ‘धर्मदंड’ होता है। राजदंड राजा के पास रहता था और धर्मदंड पुरोहित के पास होता था।

क्या है सेंगोल का इतिहास?
सेंगोल यानी समृद्धि का प्रतीक राजदंड। देश में इसका इतिहास ईसा पूर्व तक है। सेंगोल का सबसे पहले इस्तेमाल मौर्य साम्राज्य (322 से 185 ईसा पूर्व) में सम्राट की शक्ति के तौर पर किया जाता था।
मौर्य साम्राज्य के बाद गुप्त साम्राज्य (320 से 550 ईस्वी), चोल साम्राज्य (907 से 1310 ईस्वी) और विजयनगर साम्राज्य (1336 से 1646 ईस्वी) में भी सेंगोल इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। मुगलों और अंग्रेजों ने भी अपनी सत्ता और साम्राज्य की संप्रभुता के प्रतीक की तौर पर सेंगोल (राजदंड) का प्रयोग किया।



