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नक्सली कमांडर हिड़मा के पैतृक गांव पूवर्ती में हैं 647 वोटर, कोई भी नहीं करता मतदान

हिड़मा

बस्तर का पूवर्ती गांव, जहाँ की आबादी लगभग 1200 की है। इस गांव का संबंध नक्सली कमांडर हिड़मा से बताया जाता है। यानि हिड़मा इसी गांव का है। इस गांव में 647 वोटर भी हैं, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव  में किसी ने वोट नहीं किया। ऐसा नहीं है कि शासन या चुनाव आयोग ने कोई प्रयास नहीं किया हो। बाकायदा लोगों की जनगणना करवाई गई है। वोटर लिस्ट में लोगों के नाम दर्ज हैं, कार्डभी जारी किए गए हैं लेकिन कोई भी मतदान नहीं करता।
गांव वालों से पूछने पर कि क्या वे हिड़मा की मौत से नाराज हैं तो बताते हैं कि चुनाव में सरकारी अमला आता है लेकिन कोई भी व्यक्ति वोट नहीं करता। जब पूछिए कि क्या उन्हें नक्सलियों का डर सताता है या उन्हें सरकार से किसी तरह की नाराजगी है। तो सभी चुप हो जाते हैं।

इधर सरकार नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद अमन चैन कायम होने की बात कर रही है। लोगों में उसका डर खत्म होने की बात कह रही है। लेकिन मतदान नहीं होने के साथ ही कई सारे सवाल खुद ही उठने लगते है…कि क्या, लोकतंत्र पर अभी भी उस गांव के लोगों को भरोसा नहीं है और नहीं तो क्यों?… क्या हिड़मा की हत्या के बाद भी लोगों में दहशत है जिसे प्रशासन खत्म नहीं कर पाया?…क्या उस गांव के लोग नक्सल विचारधारा से प्रभावित हैं?

अगर ऐसा है तो नक्सलियों ने निःसन्देह इस बात को नागरिकों के मन में डाल दिया है, कि जिस दिन नक्सली संगठन खत्म हो जाएंगे उस दिन जंगल बेच दिया जाएगा, आप बेघर हो जाएंगे। नक्सलियों द्वारा लोकतंत्र के खिलाफ उन्हें भड़काया जाता है। समय समय पर उन्हें डराया भी जाता है।
सरकार को उनलोगों को अपने भरोसे में लेने के लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है। जिसमें सरकार नाकामयाब दिखती है। जिस दिन जनता में नक्सलियों का डर समाप्त हो जाएगा, जिस दिन सरकार और व्यवस्था के साथ प्रेम हो जाएगा। युवा इनके प्रति आकर्षित नहीं होंगे… लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए स्कूल कॉलेज भेजना शुरू कर देंगे। वहां के लोगों को रोजगार मिलेगा तो लोग हिंसा के रास्ते को छोड़ देंगे। यदि प्रशासन वहां के लोगों को हर सुविधा उपलब्ध कराना शुरू करेगी। फिर कोई उसे हिंसा के रास्ते नहीं ले जा सकता है।

समय समय पर अलग अलग मानवाधिकार संगठनों ने इस तरह के पहल की मांग की भी तो उन्हें भी नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया। किसी भी हद में हिंसा के समर्थन नहीं किया जा सकता। नक्सलियों के खिलाफ कड़ी पुलिसिया कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी ध्यान देना चाहिए कि गांव के लोग की मनोस्थिति क्या है।

क्यों लोग नक्सलियों के आदेश मानने को मजबूर हैं। सरकारी सुविधाए लोगों से क्यों कोसों दूर हैं।

आदिवासियों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिले। पीने को शुद्ध पानी, स्कूल-कॉलेज , अस्पताल, दवाइयां, रोजगार, खेती के लिए जमीन मिले।इसके अलावा उनके जंगल को भी सुरक्षित किया जा सके। सरकार को सीधा संवाद करना चाहिए। तभी जाकर आदिवासियों या कहें जंगलवासियों का भरोसा लोकतंत्र में बढ़ेगा।

सौरभ झा की कलम से- (लेखक  जानेमाने चुनावी रणनीतिकार हैं। उपरोक्त सम्पादकीय इनका निजी विचार है)

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